कभी दुकान में करते थे नौकरी, मुश्किल हालातों से लड़कर पुलिस में हुए भर्ती; कुछ ऐसी है एसीपी की कहानी

कभी दुकान में करते थे नौकरी, मुश्किल हालातों से लड़कर पुलिस में हुए भर्ती; कुछ ऐसी है एसीपी की कहानी

सर्वप्रिय भारत/नई दिल्ली

53 वर्षीय वीरेंद्र पुंज दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक व एलएलबी की पढ़ाई कर चुके हैं। काफी मुश्किल हालातों का सामना करते हुए वीरेंद्र पुंज ने कामयाबी को हासिल किया है। एसीपी वीरेंद्र पुंज 33 वर्षों से दिल्ली पुलिस में अपनी सेवा दे रहे हैं। एसीपी वीरेंद्र पुंज 32 वर्षों से दिल्ली पुलिस में अपनी सेवा दे रहे हैं। 53 वर्षीय वीरेंद्र पुंज दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक व एलएलबी की पढ़ाई कर चुके हैं। काफी मुश्किल हालातों का सामना करते हुए वीरेंद्र पुंज ने इस कामयाबी को हासिल किया है। करावल नगर, सोनिया विहार, गोकलपुरी व शकरपुर थाने में पुलिस सेवा देने के बाद प्रीत विहार डिवीजन में एसीपी के पद पर कार्यरत रहे। वीरेंद्र पुंज अभी बाराखंबा स्थित विजिलेंस में एसीपी के पद पर तैनात हैं.

वीरेंद्र पुंज ने बताया कि उनके बचपन की दिल्ली आज बहुत बदली बदली सी नजर आती है। उन दिनों दिल्ली के वातावरण में एक अपनत्व भी भावना थी। पर्यावरण भी अपनी ओर आकर्षित करता था। सड़कें खाली होती थी तो पैदल ही यमुनापार से राजघाट तक का रास्ता नाप लिया करते थे। रोजाना गांधी नगर से दोस्तों के साथ पैदल राजघाट तक सैर करने जाता था। वहां का प्राकृतिक सौंदर्य आंखों में रम जाता था। वहां बैठकर स्वच्छ व निर्मल यमुना का दीदार भी करते थे। दोस्तों के साथ खेलकूद, स्कूल व कालेज की पढ़ाई वो साथ आज बहुत याद आता है।वैसे तो मैं एक बहुत ही साधारण से परिवार में जन्मा और पला बढ़ा, लेकिन बचपन से ही जीवन में कुछ बड़ा करने का जुनून सवार हो गया था। बचपन से ही पढ़ाई के साथ परिवार की जिम्मेदारियों को संभाल लिया था। गांधी नगर के एक सरकारी स्कूल से दसवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी करने के बाद (1982-87 तक) एक दुकान पर काम शुरू किया। साइकिल पर गांधी नगर से भागीरथी पैलेस व सदर बाजार भरी दोपहर में सामान लेने जाना व रात तक उस सामान को दुकानों पर पहुंचाना और बचे हुए समय में अपनी पढ़ाई करना व परिवार चलाना ही जीवन का मकसद हो गया। 12वीं पास करते ही दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया। कालेज से घर आने के बाद दुकान जाता था और रात दस बजे तक दुकान पर काम करता था।

दिल्ली विवि में पढ़ाई करते हुए वह दिल के एक कोने में बस गया। आज भी दिल्ली विवि से गुजरता हूँ, तो कालेज के वो सुनहरे दिन आंखों के सामने एक चलचित्र की तरह घूमने लगते हैं। दिल्ली विवि की लॉ फैकल्टी की कैंटीन के समोसे और चाय का स्वाद आज भी याद है। अब भी समय मिलता है तो वहां दोस्तों के साथ जरूर जाता हूं।

और देखते देखते रिहायशी ईलाका बन गया एशिया का सबसे बड़ा कपड़ा बाजार

बचपन में जिस दिल्ली को जिया वह बहुत शांत थी। एक अपनापन था, हर कोई एक दूसरे को जानता था और मिल-जुलकर रहते थे। 1947 में बंटवारे के बाद मेरा परिवार लाहौर से दिल्ली आया। जन्म व लालन पालन सब दिल्ली में हुआ। दिल्ली में सबसे बड़ा बदलाव मैंने यह देखा कि जब पंजाब में आतंकवाद अपनी चरम सीमा पर था तब काफी लोग दिल्ली के गांधी नगर में आकर बस गए। मेरा बचपन भी गांधी नगर में ही बीता। वहां अशोक गली मार्केट में सबसे ज्यादा लोग पंजाब से आकर बसे। वहां पहले तांगे चलते थे और चार सीटर फटफट सेवा चलती थी। सड़कें खाली रहती थी पैदल ही पूरा गांधी नगर नाप लेते थे। सड़क के दोनों ओर से बसें चलती थी लेकिन देखते ही देखते एक रिहायशी ईलाका कमर्शियल इलाके में परिवर्तित हो गया। पहले यहां की गलियों में हम आठ-दस किलोमीटर पैदल चलते थे और अब तो 100 मीटर भी चलना मुश्किल है। बचपन में जिन खाली सड़कों पर हम दोस्तों के साथ खेला करते थे देखते ही देखते वह अब एशिया की सबसे बड़ी कपड़ा मार्केट बन गई है। मैं अब भी वहां की एक-एक गली व घर से वाकिफ हूं लेकिन आज उन पतों के मायने बदल चुके हैं।

आइटीओ पुल के पास सड़क हादसे में खो दिया था पिता को

1987 में स्टाफ सलेक्शन कमीशन(एसएसई) की परीक्षा पास की, लेकिन वो दिन भी मेरे जीवन में एक काल की तरह आया। जब मैं एसएसई की परीक्षा देकर आया, तो घर आकर पता चला कि आइटीओ ब्रिज के पास एक सड़क हादसे में पिता जी की मृत्यु हो गई। उस दिन मैंने प्रण लिया था कि सड़क हादसे में जीवन खो देने वालों के परिवार को इंसाफ दिलाना ही जीवन का मकसद होगा। इसके बाद डेढ़ वर्ष तैयारी के बाद 1989 में दिल्ली पुलिस में सब इंसपेक्टर के तौर पर एसएसई में चयन हुआ मैं अब तक तीन परिवारों को इंसाफ दिला चुका हूं, जिन्होंने सड़क हादसे में अपनो को खो दिया था।